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स्वयं से अनभिज्ञ(कविता)

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मै स्वतंत्रता का अभिलाषी,
उड़ना बस चाहूँ नील गगन मेँ।
बेड़िया मुझे स्वीकार नहीँ,
स्वच्छन्द विचरता मुक्त पवन मेँ।।
मंगल से लेकर चाँद तलक, मैने सबकुछ है माप लिया ।
धरती से सूरज की गहराई ,
खुद निर्मित यंत्रोँ से भाँप लिया ।।
है लोग मुझे मानव कहते ,
मेरी इच्छाए है अपार ।
नयी नयी खोजे करता मै
नित चुनौतियाँ करता स्वीकार ।।
अंबर पर है अधिकार मेरा , जल थल पर चलता राज्य मेरा ।
सूरज तक खोज मेरी जारी ,प्रकृति भी है मुझसे हारी ।।
अफसोस कि मैने जीता बाहरी जगत ,पर खुद को जान न पाया मै ।
मेरे अंदर है कौन बसा ,अनुमान लगा ना पाया मै ।।
सब कुछ अपने अंतरतम मेँ,
मै बाह्य जगत मेँ घूम रहा ।
मै स्वयं प्रकाश रुप होकर ,
अँधेरे मेँ क्यूँ डुब रहा ।।

अरुण चतुर्वेदी ‘अनंत’

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
September 2, 2013

सुन्दर ,सरल और प्रभाबशाली रचना। बधाई। कभी यहाँ भी पधारें। सादर मदन


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