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कुसुम की कहानी,कुसुम की जुबानी

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धरा हँस उठी जब मैँ खिला ।
धरती के आँचल मेँ मैँ जग उठा ।।
भ्रमर गुनगुनाने लगे देख मुझको ।
यूँ बना हूँ मै खातिर उन्हीँ के लिए ।।
देवोँ के भीतर गजब लालसा थी ।
लगी होड़ उनमेँ मेरी कामना थी ।।
हर शख्स था दीवाना मेरा ।
पर मेरी दशा तो सबसे जुदा थी ।।
मँत्री जी मुझको बहुत चाहते थे ।
कँठाहार बनूँ मैँ उनका मुझसे ये माँगते थे ।।
किसी को मेरे जीवन की न परवाह थी ।
खुद को चमकाने की ही सबकी आस थी ।।
ख्वाहिशेँ पल रहीँ थी मेरे भी अंदर ।
दिल मेँ भरा था एक गहरा समंदर ।।
मै तो चाहता था मिटूँ मैँ धरा पर ।
अपनी हस्ती मिटा दूँ खुद की धरा पर ।।
बिना चाहतोँ के पाला था उसने ।
सबकुछ दिया जो माँगा था मैने ।।
दिल मेँ मेरे भी हसरत पल रही थी ।
बिन जलाये जिया मे दिया जल रही थी ।।
एक दिन अनोखी सी घटना घटी ।
जवानोँ की टोली थी मिटने चली ।।
मैने शाख छोड़ी गिरा उनके आगे ।
मिला मुझको सबकुछ मेरे भाग्य जागे ।।
जवानोँ के पैरोँ तले मै कुचलकर ।
मिटटी मे सनकर ,धरा मेँ सिमटकर ।।
हुआ धन्य जीवन मेरा उसी पल ।
न्योछावर हुआ मातृभूमि पर हँसकर ।।

अरुण चतुर्वेदी ‘अनंत’

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
August 30, 2013

बहुत उत्कृष्ट अभिव्यक्ति.हार्दिक बधाई और शुभकामनायें! कभी यहाँ भी पधारें

arunchaturvedi के द्वारा
September 21, 2013

मदन जी सादर प्रणाम उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार।


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